सोमवार, 24 नवंबर 2008

माना था जिसे ज़िन्दगी अपनी वो ही दिल तोड़ कर चल दिए
आखों में आंसू होठों पर फरियाद छोड़ गए
अब कैसे जखम भरेंगे इस टूटे दिल के
जब मरहम लगाने वाले ख़ुद जखम दे गए
हमकदम बन के साथ चलने का वादा था उनका
बीच राह में तनहा छोड़ कर दर्द वो दे गए
उम्मीद थी वफा की जिनसे वो ही बेवफा बन गए
मौत ही आके
गले लगा ले तो एक बार आ जाना
क्यों की आखरी इच्छा में आरजू आपकी हम कर गए

4 टिप्‍पणियां:

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

आपने बहुत अच्छा लिखा है ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

संगीता पुरी ने कहा…

आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है। आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

बेनामी ने कहा…

ब्लॉग जगत में स्वागत है

अब, आज 27 नवम्बर के दिन
आईये हम सब मिलकर विलाप करें

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर ने कहा…

bahut khub kaha. narayan narayan